जनसंख्या का आर्थिक विकास पर प्रभाव (छत्तीसगढ़ राज्य के संदर्भ में)

 

बी एल सोनेकर  एवं  आर के ब्रम्हे

अर्थशास्त्र अध्ययनशाला, पं. रविशंकर शुक्ल विश्वविद्यालय, रायपुर (..)

 

1ण्  प्रस्तावना

किसी भी देश या राज्य के आर्थिक विकास में प्राकृतिक साधनों और पूंजी का महत्वपूर्ण स्थान होता है लेकिन ये सजीव पदार्थ नहीं है। वास्तव में किसी देश की आर्थिक विकास की गति वहाँ के मानवीय संसाधन की योग्यता और कार्यकुशलता पर निर्भर करता है। मानवीय संसाधन और आर्थिक विकास में प्रत्यक्ष सम्बन्ध होता है, क्योंकि आर्थिक विकास में तकनीकी ज्ञान, शिक्षा, नवीन आविष्कार, तकनीकी प्रयोग आदि का काफी महत्व होता है, जिसका सम्बन्ध मानवीय संसाधन से होता है। ‘‘आधुनिक राष्ट्रों का निर्माण मनुष्यों के विकास एवं मानवीय क्रियाओं के संगठन पर निर्भर करता है। निःसंदेह पूंजी, प्राकृतिक साधन, विदेश सहायता और अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, आर्थिक विकास में भूमिका निभाते हैं, लेकिन इनमें से कोई उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि मानव शक्ति।’’

 

आर्थर लुईस के अनुसार -‘‘आर्थिक विकास मानवीय प्रयत्नों का परिणाम है। आर्थिक विकास पूरी तरह मानवीय साधनों पर निर्भर करता है, इसलिए मानवीय संसाधनों का आर्थिक विकास की एक पूर्ण आवश्यकता कही जा सकती है।’’

 

प्रत्येक देश या राज्य की उन्नति दो बातों पर निर्भर करता है - (1) प्राकृतिक साधन (2) मानवीय साधन। प्राकृतिक साधनों के अभाव में आर्थिक विकास करना संभव हो सकता है, किन्तु उत्कृष्ट जनसंख्या के अभाव में आर्थिक विकास करना असंभव होता है। कारण यह है कि जनसंख्या आर्थिक विकास का साधन तथा साध्य दोनों है।

 

प्रोफेसर .के. मुखर्जी के अनुसार - ‘‘किसी भी राष्ट्र की उन्नति मानवीय संसाधन को संगठित करने की क्षमता पर निर्भर करता है।’’ निःसंदेह किसी भी देश में जनशक्ति को राष्ट्र की भारी पूंजी मानी जाती है, लेकिन इस साधन का अगर समुचित उपयोग हो और नये रोजगार के अवसर उपलब्ध किये जाए तो यह साधन राष्ट्र के लिए भार स्वरूप बन जाता है। सामान्यतः आर्थिक विकास का मापन प्रति व्यक्ति आय द्वारा किया जाता है। जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ प्रति व्यक्ति आय में कभी स्थिरता तथा वृद्धि देखी जाती है। यदि जनसंख्या की वृद्धि स्थिर है और कुल राष्ट्रीय आय बढ़ रही है तो प्रति व्यक्ति आय भी बढ़ती है, जबकि जनसंख्या की वृद्धि दर कुल राष्ट्रीय आय के वृद्धि दर से अधिक हो तो प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय आय कम होने लगती है। इसी प्रकार दोनों समान गति से बढ़ रहे हो, तो प्रतिव्यक्ति आय और राष्ट्रीय आय भी यथावत रहती है। इस संदर्भ में आर्थिक विकास पर जनसंख्या के प्रभाव को अनुकूलतम जनसंख्या सिद्धांत द्वारा स्पष्ट किया जा सकता है। साथ ही देश की आर्थिक प्रगति कार्यशील जनसंख्या के ऊपर निर्भर करती है और इस कार्यशील जनसंख्या में 15 से 64 वर्ष तक के आयु के लोगों को सम्मिलित किया जाता है, जिसे राष्ट्रीय आय का प्रमुख निर्धारत तत्व माना गया है, क्योंकि जनसंख्या के बढ़ने से श्रमिकों की संख्या बढ़ती है, परिणाम स्वरूप श्रम विभाजन तथा विशिष्टीकरण के कारण उत्पादन में वृद्धि होती है। इसलिए कहा जाता है कि जनसंख्या वृद्धि आर्थिक विकास में बहुत सहायक होती है; किन्तु यदि देश में पहले से ही अधिक जनसंख्या है तो जनसंख्या वृद्धि से बेरोजगारी की समस्या का अपने आप में समाधान नहीं होता, संभव यह है कि यदि रोजगार आयोजन की ओर ध्यान दिया जाए तो आर्थिक विकास की गति तेज होने के बावजूद भी बेरोजगारी की समस्या बनी रहेगी। यही कारण है कि विकासशील देशों में अन्य उत्पत्ति के साधनों के अभाव में अतिरिक्त श्रम को नहीं खपाया जा सकता। इससे इन देशों में बेरोजगारी का कारण बढ़ती हुई जनसंख्या होती है। साथ ही आर्थिक दृष्टि से विकसित एवं पूंजी सम्पन्न देशों में जनसंख्या वृद्धि कोई विशेष समस्या नहीं होती, क्योंकि ऐसे देशों में उपलब्ध पंूजी एवं अन्य परिपूरक साधनों की सहायता से अतिरिक्त जनसंख्या को सरलता से उत्पादक कार्यों में लगाया जा सकता है, लेकिन अल्प विकसित देशों में पहले से ही जनसंख्या का आधिक्य होता है इसलिए बेरोजगारी की समस्या और भी गंभीर हो जाती है, क्योंकि पूंजी एवं परिपूरक साधनों के अभाव में अतिरिक्त जनसंख्या को पूर्ण रोजगार प्रदान नहीं किया जा सकता।

 

अतः इस शोध का प्रमुख उद्देश्य जनसंख्या का शिक्षा, उत्पादन, रोजगार, आय पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका अध्ययन करना है, क्योंकि इसे आर्थिक विकास का प्रमुख सूचक माना जाता है।

 

प्प्ण्                                            जनसंख्या और शिक्षा

शिक्षा, सभ्यता, संस्कृति और आर्थिक विकास का मूल आधार है। इतिहास इस बात का गवाह है कि जिन देशों में शिक्षा को प्रोत्साहित किया गया वे सभ्य और विकसित हुए हैं। इस प्रकार स्पष्ट है कि शिक्षा और विकास साथ-साथ चलते हैं। प्राचीन समय से ही शिक्षा को महत्वपूर्ण स्थान दिया जाता रहा है। वेदों में कहा गया - ‘‘सा विद्या या विमुक्तये’’ अर्थात् शिक्षा से अज्ञानता, शोषण एवं दुख से छुटकारा मिलता है।

                                                 

 

छत्तीसगढ़ राज्य में जनसंख्या वृद्धि के साथ शिक्षा के स्तर में भी विकास हुआ है। वर्ष 1991 में साक्षरता का स्तर 42.98 प्रतिशत था, तब जनसंख्या वृद्धि दर 25.73 प्रतिशत रहा। इस दृष्टि से शिक्षा में वृद्धि जनसंख्या वृद्धि की तुलना में अधिक है। इसका मुख्य कारण शिक्षा के स्तर में विकास होना है। यही आंकड़े अगर 2001 में देखे तो पाते हैं कि यहाँ जनसंख्या वृद्धि दर 18.27 प्रतिशत और शिक्षा स्तर में 65.18 प्रतिशत वृद्धि हुई है। इस आधार पर छत्तीसगढ़ की जनसंख्या वृद्धि के साथ शिक्षा स्तर में तीन गुना से भी अधिक वृद्धि हुई है, जिसका मुख्य कारण नई शिक्षा नीति, साक्षरता अभियान और 6 से 14 वर्ष आयु के सभी बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा है, साथ ही सभी स्तरों के स्कूली शिक्षा और महाविद्यालयांें का विकास रहा है।

 

छत्तीसगढ़ राज्य में 31,086 पूर्व प्राथमिक/प्राथमिक विद्यालय, 6621 माध्यमिक विद्यालय, 1161 हाईस्कूल/ .मा. विद्यालय, 1506 माध्यमिक (10$2) विद्यालय, 116 सामान्य शैक्षणिक महाविद्यालय तथा 22 तकनीकी शिक्षण संस्थाएँ हैं।

 

राज्य में पुरूष साक्षरता दर 77.4 प्रतिशत तथा महिला साक्षरता 51.9 प्रतिशत है, जबकि वर्ष 1991 में पुरूष साक्षरता 58.1 प्रतिशत रहा और महिला साक्षरता 27.5 प्रतिशत ही रही, अर्थात् महिला साक्षरता में दुगुना शिक्षा का विस्तार केवल दस वर्षों में ही हुआ। इस दृष्टिकोण से वर्ष 1991 की तुलना में वर्ष 2001 में शिक्षा का विकास आशातीत दुगुना रहा, जो राज्य में शिक्षा के विकास को सूचित करता है। 

 

प्प्प्ण्                                           जनसंख्या और उत्पादन

जब से माल्थस ने अपने प्रसिद्ध गं्रथ ‘‘एसे आन पापुलेशन’’ की रचना की है, तब से जनसंख्या बनाम खाद्य संरक्षण और उत्पादन की समस्या पर ध्यान केन्द्रित हो गया। इसमें संदेह नहीं कि छत्तीसगढ़ में प्रति व्यक्ति कृषि योग्य भूमि कम होते जा रहे हैं, पर दूसरी ओर औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि हो रही है, जो जनसंख्या वृद्धि और उत्पादन पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष प्रभाव को दर्शाता है।

 

मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ की जनसंख्या को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है - उत्पादक उपभोक्ता और अनुत्पादक उपभोक्ता। उत्पादक उपभोक्त शब्द का प्रयोग जनसंख्या से उस भाग से है जो राष्ट्रीय आय में योगदान करता है। दूसरे शब्दों में, इससे राज्य की श्रम शक्ति का बोध होता है। अनुत्पादक उपभोक्ता वर्ग में वे सभी व्यक्ति शामिल है जो अपने पालन-पोषण के लिए दूसरों पर निर्भर हैं, मुख्य रूप से बच्चे, बूढ़े और 15 से 59 वर्ष तक के आयु के बेरोजगार व्यक्ति अनुत्पादक उपभोक्ता वर्ग में समाविष्ट होते हैं।

 

वर्ष 1991 की जनगणना के अनुसार राज्य के कुल जनसंख्या का 38 प्रतिशत भाग कार्यशील जनसंख्या है, जिसमें लगभग 52 प्रतिशत पुरूष एवं 23 प्रतिशत महिलाएँ हैं जो कि जनसंख्या वृद्धि 18.06 प्रतिशत के आधार पर है। पिछले 10 वर्षों की तुलना में पुरूषों की कार्य सहभागिता दर तो समान ही है, पर महिलाओं की कार्य सहभागिता दर में 17.04 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जो जनसंख्या वृद्धि के साथ कार्य सहभागिता दर में वृद्धि को दर्शाता है।

 

इसी प्रकार प्रदेश में खाद्यान्न उत्पादन के साथ-साथ औद्योगिक उत्पादन में भी उत्तरोत्तर वृद्धि जनसंख्या वृद्धि के साथ देखा गया है। साथ ही मत्स्य उत्पादन तथा प्रदेश में गौण तथा प्रमुख खनिजों के उत्पादन में भी वृद्धि हुई है, जो राज्य की आर्थिक विकास को सूचित करता है। यही कारण है कि जहाँ एक ओर वर्ष 1991 में जनसंख्या वृद्धि 25.73 प्रतिशत थी, वहीं कुल उत्पादन कम था जबकि वर्ष 2001 में 18.06 प्रतिशत जनंसख्या वृद्धि के साथ खाद्यान्न उत्पादन और खनिज उत्पादन में वृद्धि हुआ है, जो राज्य के आर्थिक विकास को सूचित करता है।

 

प्टण्                                            जनसंख्या और रोजगार

बढ़ती हुई जनसंख्या के साथ-साथ की श्रम शक्ति में वृद्धि होती है, परिणामस्वरूप रोजगार के कम आसार और बेरोजगारी की समस्या और जटिल हो जाती है। जनसंख्या वृद्धि के साथ राज्य में रोजगार की स्थिति संतोषजनक नहीं कहा जा सकता। दिसंबर 2001 तक चालू पंजी द्वारा कुल शिक्षित बेरोजगारों की संख्या 8 लाख 15 हजार 849 थी। इसके अलावा एक बहुत बड़ा वर्ग ऐसा है जिसके नाम पर पंजीयन रोजगार कार्यालयों में हुआ ही नहीं है। राज्य में सबसे अधिक लोग स्कूल शिक्षा में सेवारत हैं। शासकीय कर्मचारियों के कुल रोजगार का 27.83 प्रतिशत शिक्षा में रत हैं।

 

देश के दूसरे राज्य की तुलना में छत्तीसगढ़ में रोजगार की स्थिति संतोषजनक नहीं है। पिछले दो दशक में राज्य में हुए औद्योगिक आर्थिक विकास के धीमे क्रम ने स्थिति को प्रतिकूल ही बनाया है। देश के दूसरे हिस्से की तरह यहाँ भी अधिकांश क्षेत्र में आई मंदी ने निश्चित तौर पर इस स्थिति को और भयावह बनाया है। छत्तीसगढ़ राज्य के गठन के बाद रोजगार के अवसर बढ़ने की उम्मीद की जा रही है। यही कारण है कि राज्य के गठन के पश्चात वर्ष 1991 की तुलना में रोजगार में 9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। वर्ष 2001 में राज्य के कुल कर्मी जनसंख्या 9679871 है। इसमें पुरूष 52.8 प्रतिशत एवं 40.04 प्रतिशत की स्तर पर हैं, जिसमें राज्य के दीर्घकालिक कर्मी जनसंख्या 7054595 व्यक्ति एवं अल्पकालिक कर्मी 2625276 व्यक्ति सम्मिलित है। राज्य और उनके विविध जनसंख्या रोजगार की विभिन्न क्षेत्रों में हैं। वर्ष 2001 के अनुसार खेतिहर मजदूर की संख्या 9274084 व्यक्ति है और पारिवारिक उद्योगकर्मी 596020 व्यक्ति सम्मिलित हैं एवं अन्य कर्मियों में 6236033 व्यक्ति सम्मिलित हैं, जिसमें दीर्घकालिक कर्मी का अनुपात 72.88 प्रतिशत, अल्पकालिक कर्मियों का अनुपात 27.12 प्रतिशत, पारिवारिक उद्योग में 2.05 प्रतिशत और अन्य कर्मी का अनुपात 21.47 प्रतिशत है। राज्य में जनंसख्या के साथ-साथ रोजगार में भी वृद्धि हो रही है। सेवा श्रेणी के आधार पर शासकीय कर्मचारियों की विभागवार संख्या को तालिका के माध्यम से देख सकते हैं।

 

 

तालिका-1

सेवाश्रेणी के आधार पर शासकीय कर्मचारी की विभागवार संख्या-2001

क्र.                                             विभाग का नाम    प्रथम  द्वितीय                                                तृतीय      चतुर्थ  योग   प्रतिशत

1                                               स्कूल शिक्षा 25     2111   45599                                                3017 50752  27.83

2                                               गृह विभाग  73     181    20199  194                                                20647       11.32

3                                               लोक स्वा. एवं परिवार कल्याण   174                                                1447 12885  2036   16542  9.07

4                                               आदिम जाति कल्याण     36                                                1632 26098  3782   31548  17.30

5                                               वन  75     417    8790   723                                                10005       5.49

6                                               कृषि 44     148    4633   84                                                5668 3.11

7                                               जलसंसाधन 111    675    4759   934                                                6479 3.55

8                                               राजस्व     51     286    6166                                                2039 8542   4.68

9                                               अन्य विभाग       832    3438                                                21634       6110   321698 17.64

स्रोत - संचालक, रोजगार एवं प्रशिक्षण छत्तीसगढ़, रायपुर

 

 

टण्  जनसंख्या और प्रति व्यक्ति आय

वर्ष 2001 के अनुसार राज्य की कुल जनसंख्या 207.95 लाख अनुमानित है, जिसमें से 104.52 लाख पुरूष एवं 103.43 महिलाएँ हैं।

 

प्रतिव्यक्ति आय से तात्पर्य राज्य की जनता की औसत आय से है, जिसे एक राज्य की आय में से उस राज्य की कुल मानव जनसंख्या का भाग देकर ज्ञात की जाती है और इसके आधार पर ही उस राज्य की जनता के जीवन-स्तर का अनुमान लगाया जाता है, जो राज्य के विकास को सूचित करता है, जिसे तालिका द्वारा देखा जा

सकता है।

 

तालिका-2

प्रति व्यक्ति सकल राज्य घरेलू उत्पाद (प्रचलित/स्थिर भावों के आधार पर) की प्रगति (राशि रू. में)

वर्ष                                             वर्ष  प्रति व्यक्ति सकल राज्य घरेलू उत्पाद के आधार पर

                                                     प्रचलित भावों के आधार पर                                                स्थिर भावों पर

1                                               2000-2001   12601  12583

2                                               2001-2002   14311  14115

3                                               2002-2003   15359  13783

4                                               2003-2004   18205  15882

5                                               2004-2005   20402  16570

6                                               2005-2006   22353  17933

7                                               2006-2007   25680  19233

स्रोत: आर्थिक सर्वेक्षण वर्ष 2007-2008, छत्तीसगढ़ शासन

तालिका से स्पष्ट होता है कि प्रचलित भावों के आधार पर प्रतिव्यक्ति आय 12,601 रू. से बढ़कर वर्ष 2006-07 में 25,680 रू. हो गई है। इस प्रकार प्रचलित भावों के आधार पर प्रतिव्यक्ति आय में 103.79 प्रतिशत वृद्धि हुई है, जबकि स्थिर भावों (1999-2000) के आधार पर प्रतिव्यक्ति आय 12,583 रू. से बढ़कर 19,233 रू. हो गई है। इस प्रकार स्थिर भावों के आधार पर प्रतिव्यक्ति आय में 52.85 प्रतिशत वृद्धि हुई, जो राज्य के विकास को सूचित करता है।

 

सुझाव                                         

                                               छत्तीसगढ़ के आर्थिक विकास के लिए क्षेत्र की जनसंख्या का परिणात्मक दृष्टि से नियंत्रण करना बहुत आवश्यक है। अभी भी प्रदेश में जन्मदर ऊँची तथा मृत्यु दर नीची है, जिसे रोकने के लिए विगत दो दशकों से क्षेत्र में परिवार नियोजन कल्याण कार्यक्रम चलाये जा रहे हैं, जिसे वांछित सफलता तो मिली है, लेकिन इसका और अधिक प्रभावशाली ढंग से प्रचार करना चाहिए, ताकि महिलाओं के साथ-साथ पुरूष भी आगे आये।

                                               स्वास्थ्य स्तर को बढ़ाने के लिए अधिक मात्रा में स्वास्थ्य केन्द्रों की स्थापना की जानी चाहिए, जिसमें लोगों की कार्यक्षमता में वृद्धि हो सके। साथ ही तकनीकी शिक्षा पर भी विशेष बल दिया जाना चाहिए, ताकि श्रमिकों की कार्यकुशलता में वृद्धि हो सके।

                                               राज्य में उपलब्ध जनसंख्या का उचित उपयोग करके आर्थिक विकास की गति में वृद्धि की जा सकती है। इसके लिए आवश्यक है कि सबसे पहले क्षेत्र में बड़ी मात्रा में विद्यमान अतिरिक्त श्रमशक्ति की आर्थिक विकास के लिए उपयोग किया जाय, जैसे - राज्य के कृषि क्षेत्र में जनसंख्या का भार अधिक है, जिसे छिपी बेरोजगारी की समस्या के रूप में देखा जा सकता है, उसे कृषि से हटाकर अन्य उत्पादक व्यवसाय में लगाया चाहिए, जिससे कृषि उत्पादन तो उतनी ही रहेगी पर अन्य व्यवसाय क्षेत्र में उत्पादन बढ़ेगा और लोगों के आय में वृद्धि होगी और उनकी जीवन-स्तर भी ऊँचा उठेगा। इसके लिए आवश्यक है ग्रामीण क्षेत्रों में विद्युत शक्ति का विस्तार करके लघु एवं कुटीर उद्योग को प्रोत्साहन दिया जाए। साथ ही कृषि क्षेत्र में विकास के लिए सिंचाई सुविधाओं का विस्तार किया जाना चाहिए एवं उन्नत बीज, खाद, दवा, यंत्र आदि किसानों को वितरण कर सघन खेती के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए तथा कृषि सहायक व्यवसायों के पर्याप्त विकास भी आवश्यक है, जिसमें पशुपालन, दुग्ध व्यवसाय, मुर्गीपालन, मत्स्यपालन, सुअर पालन आदि सम्मिलित है, जिससे आर्थिक विकास को गति मिलेगा और साथ ही ग्रामीण आर्थिक ढाँचा भी सफल होगा।

                                               इसी प्रकार राज्य में विद्युत शक्ति प्राकृतिक सम्पदा तथा खनिज साधन बिखरे पड़े हैं, जिसे नियोजित किया जाना चाहिए इससे लोगों को केवल रोजगार मिलेगा, बल्कि क्षेत्र के औद्योगिक विकास को भी प्रोत्साहन मिलेगा। साथ ही खनिजों के दोहन के लिए उचित औद्योगिक नीति अपनायी जानी चाहिए, ताकि राज्य का त्रीव औद्योगिक विकास हो सके। इसी प्रकार पर्याप्त आर्थिक विकास के लिए रोजगार की मात्रा में वृद्धि करने के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में पूंजी निवेश को बढ़ावा दिया जाना चाहिए ताकि आर्थिक विकास को एक नई गति दी जा सके।

 

उपरोक्त सुझावों की ही यदि ईमानदारी से पालन किया जाय तो केवल राज्य के विकास का सपना पूरा होगा, बल्कि छत्तीसगढ़ विकास की दृष्टि से देश में अग्रणी राज्य भी बन जायेगा।

 

संदर्भ:

                                               छत्तीसगढ़ श्रृंखला 23, 2001

                                               छत्तीसगढ़ का आर्थिक सर्वेक्षण 2006-2007, छत्तीसगढ़ शासन

Received on 22.09.2009

Accepted on 11.11.2009     

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Research J.  of Humanities and Social Sciences. 1(1): Jan.-March 2010, 45-47